Vishwa Shanti Sarovar, Nagpur

Nagpur History

यह विश्व विद्यालय सही अर्थ मेें सभी वर्गोे के लिए है। यहां जाति,भाषा, धर्म और देश विदेश का भेद नही किया जाता है। जहाँ सभी के साथ आत्मिक नाते से भाई-भाई मान कर व्यवहार होता है और विश्व को एक कुटुम्ब मानकर विश्व बंधुत्व की शिक्षा दी जाती है। यह विश्व विद्यालय एक प्रकाश स्तंम्भ है जो भारत के लिए गौरव भी है क्योंकि यहाँ से ही आध्यात्मिक प्रकाश की किरणे सारे विश्व मेें फैल रही हैैं। इस विश्व विद्यालय मेें परमपिता परमात्मा " शिव " परम शिक्षक के रूप मेें स्वयं सृष्टि के आदि-मध्य-अंत की बेहद पढ़ाई पढ़ाते हैैं जो सर्व मानव मात्र के लिए है। इस आध्यात्मिक पढ़ाई से विश्व मेें ऐसा परिवर्तन होता है जो कलियुग बदल सतयुग आ जाता है और सारे विश्व मेें पवित्रता, सुख, शांति की पुर्नस्थापना हो जाती है।
ब्रह्माकुमार एवं ब्रह्माकुमारीयां इस विद्यालय मेें सिखायेें जा रहे ईश्वरीय ज्ञान एवं राजयोग का अभ्यास करते हैैं और अपने गृहस्थ जीवन मेें आध्यात्मिक गुणोें को अपनाकर शांति एवं आंतरिक सुख का अनुभव करते हैैं।

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" दीदी पुष्पारानी जी " ऐसी गाथा -

सन १९४२ मुलतान (पाकिस्तान) मेें एक धार्मिक और सम्पन्न परिवार मेें दीदी जी का जन्म हुआ था। परंतु बहुत छोटी ५ वर्ष की खेलने और खिलने की उम्र मेें नियती के कठोर वज्रघात के कारण जीवन बहुत दुखी हुआ था। भारत और पाकिस्तान के विभाजन की चपेट मेें अपने परिवार के १४ सदस्योें को स्वयं अपनी नजरोें के सामने काल के मुख मेें समाते हुए देखा था। ऐसी दर्दनाक परिस्थिती मेें लौकिक पिताजी एवं दो बडे भाईयोें का भी देहांत हुआ था। इस आघात के कारण परिवार से आस्था व भक्ति का वातावरण समाप्त हुआ। तत्पश्चात दीदी जी अपने लौकिक माँ किशन देवी और बहन सावित्री दीदी के साथ करनाल मेें स्थानांतरित हुये।
 
जिस नैय्या का खिवैय्या स्वयं भगवान हो और जो नैय्या स्वयं अपने आप मेें इतनी सशक्त हो, वह भला कैसे डुब सकती ? स्वयं विधाता की जिसपर नजर थी…. वो नैय्या समय के तुफान झेलकर भी संवर गई। जैसे जैसे उम्र बढती गई पुनः भक्ति का अंकुर जागृत हुआ। अतः अनेक देवीदेवताओें के साथ श्रीकृष्ण की भी बहुत प्यार से भक्ति करती थी। प्रभु दर्शन की लालसा से पुनः पुजा, पाठ, व्रत आदि शुरू किये।
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ईश्वरीय ज्ञान -

सन् १९५६ मे किसी सहेली के द्वारा दीदी जी को पता चला कि शहर मेें कोई श्वेत वस्त्रधारी देवीयां आई है जो ईश्वरीय ज्ञान सुनाती हैैं। इस प्रकार १४ वर्ष की उम्र मेें दीदी जी परमश्रध्दे्य मनोहर दादी जी के सम्पर्क आई। उनके सादगीपुर्ण और त्यागमय जीवन का दीदी पर गहरा प्रभाव पडा। दादी जी के द्वारा जीवन दर्शन और आध्यात्मिक सत्य की समझ पाकर दीदी जी ने भी अपने जीवन को विश्व कल्याण की सेवा मेें सफल करने का संकल्प किया। तत्पश्चात अपना लक्ष्य और भावनायेें पिताश्री ब्रह्मा बाबा को पत्र के द्वारा सुचित की। पिताश्री जी के द्वारा सकारात्मक प्रत्युत्तर मिलते ही आनंद विभोर हो गई। इस प्रकार दीदी जी अपनी यथार्थ निर्णय और लौकिक माताजी के सहयोग से बाबा की सेवा मेें समर्पित हो गई।
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तपस्वी जीवन -

१९५६ से १९७२ तक भारत के विभिन्न राज्योें मेें बंगाल, बिहार, राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, मध्यप्रदेश, नेपाल तथा महाराष्ट्र के कई नगरोें मेें सेवायेें दी। आपका जीवन त्याग, तपस्या से ओतप्रेत था, जो सर्व के लिए प्रेरणा का स्त्रोत है। आप सदा ही अपने आपको निमित्त समझकर निर्माणता से हर प्रकार की सेवा मेें सदा हाजिर रहती थी।

उमंग उत्साह की विशेषता आपके रग रग मेें समाई हुई थी। बुद्धि की कुशाग्रता और हर बात को सीखने की उत्कण्ठा के स्वभाव विशेष के कारण, आप बाबा की विशेष लाडली थी।

बाबा ने उन्हेें हिंदी टायपिंग सिखने के लिए पंधरा दिन की अवधि दी थी। दादा विश्वरतन जी को सिखाने का कार्य सौैंपा था। परंतु दीदा जी ने कडी मेहनत करके ९ दिन मेें ही टाइपिंग सीख ली। जब की, दीदी जी केवल मात्र ७ वी कक्षा पढी थी परंतु उन्हेें हिंदी, सिंधी, मुलतानी, गुजराती, मराठी, पंजाबी ऐसी ६ भाषायेें आती थी। आप कुशल वक्तृत्व कला की धनी थी। ईश्वरीय सेवाओें के प्रित प्लानिंग बुद्धि और सर्व प्रकारकी आलराउण्ड सेवा करना ही आपका व्यक्तित्व था।

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नागपुर की सेवा -

ऐसा मम्मा बाबा ने तराशा हुआ हीरा, १९७२ मेें स्वयं बापदादा ने भारत के केन्द्रबिंदु नागपुर मेें विदर्भ क्षेत्र की सेवाओें के लिए जड़ दिया। विदर्भ भूमि जो दीदी जी के लिए अंजान भूमि, ना कभी देखा था ना सुना था। मराठी भाषा से बेखबर, वातावरण और खानपान के भिन्नता को भी स्वीकारते हुये, ईश्वरीय सेवा का बीज बोया। न साधन थे, न साथी थे, लेकिन सेवा का अटल लक्ष्य था। बाबा का एक बल और एक भरोसा था, जिससे इस बीज को पल्लवित करके दीदी जी ने विशाल वटवृक्ष का निर्माण किया। विदर्भ उपक्षेत्रिय संचालिका के रूप मेें सेवायेें देते हुये आपके नेतृत्व मेें कई प्रकार की सेवायेें यहां सम्पन्न हुई। जैसे कि आध्यात्मिक मेले, प्रदर्शनीयाँ , संगोष्ठी, कार्यशालायेें, यात्रायेें, मेगा प्रेग्रम्स्, समाज के विभिन्न प्रभागोें के लिए चर्चासत्र आदि आदि..

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विदर्भ की सेवा -

दीदी जी के आदर्शों से प्रेरीत होकर यहां की अनेक कन्यायेें इस विद्यालय मेें समर्पित हुई। ४०० से भी अधिक कन्याओें को श्रेष्ठ मार्गदर्शन और पालना देकर आपने ईश्वरीय सेवाओें के लिए तैयार किया। वर्तमान विदर्भ मेें १२३ सेवाकेन्द्र उपसेवाकेन्द्र एवं १००० से भी अधिक राजयोग पाठशालायेें चल रही है। ४०,००० से भी अधिक भाई बहनेें इस ज्ञान मार्ग मेें चलकर, पवित्र गृहस्थ जीवन व्यतीत कर रहे है।
आज्ञाकारिता आपका प्रमुख गुण था। बाबाकी व दादीयोें की हर आज्ञा को निःसंकल्प होकर पालन करती थी, कभी किसी सेवा के लिए ना नहीR की। एक बार पुना मेें महाराष्ट्र झोन कि मिटीRग थी। आदरणीया दादी जानकी जी, तब झोन इन्चार्ज थे। दादीजी ने पुछा महाराष्ट्र की सेवाओें को बढ़ाने के लिए मराठी साहित्य छपना चाहिये, इसकी जिम्मेवारी कौन लेेंगे ? किसीने हाथ नहीR उठाया, तो दादी जी ने पुछा -पुष्पा तुम यह जिम्मा उठायेगी ? तो दीदी जी ने तुरंत हाँ कर दी। जबकी दीदी जी को उन दिनोें मराठी भाषा भी नही आती थी और साहित्य छपाई का कोई अनुभव नही था। फिर भी दादीजी की आज्ञा को पालन करते हुए मराठी साहित्य विभाग नागपुर मेें आरंभ किया और आज मराठी मेें ५६ प्रकार की किताबे प्रकाशित हो रही है।

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प्रेरणा स्त्रोत -

कैसी भी कठिन परीक्षा की घड़ी हो लेकीन सदा निश्चिंत, अचल अडोल रहकर पेपर समझ पास करती थी। औरो मेें भी उम्मींद भरके, हर आत्मा मेें आत्मविश्वास पैदा करके उन्हेें आगे बढाती थी। दीदी जी का व्यक्तित्व बहुत पारदशीa था। अंदर बाहर की सच्चाई और सफाई उनके जीवन का अभिन्न अंग था। साकार मम्मा बाबा के संस्मरण सुनाकर सभी मेें वफादारी का गुण भरती थी…..

छोटी छोटी बहनेें व्यवहारिक ज्ञान से अनभिज्ञ होकर कुछ भुलेें कर दे, तो उसे समा लेती थी और बडे प्यार से बाबा की श्रीमत याद दिलाकर आगे के लिए सावधानी देती थी। कोई दिलशिकस्त होकर दीदी के पास आये तो दीदी उसमेें बल भर देती थी।

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ममतामई माँ -

दीदी एक ममतामई माँ थी। हर एक मेें हर सेवा की निपुणता भर जानी चाहिए, ऐसा लक्ष रखकर सबको हर कार्य सिखाती थी। हर बहन के स्वास्थ्य का ध्यान रखती, बाबा के घर मेें सभी संतुष्ट रहे, हर एक अपनी जिम्मेदारी समझ सेवा करेें, आपस मेें सभी मिलजुल के एकमत होकर प्यार से चलेें, ऐसा संस्कार सबमेें भरकर संगठन मेें बल भरती थी। एक बार एक बहन हॉस्पिटल मेें एड्मिट थी। दीदी रोज जाकर हालचाल पुछती थी। एक दिन दीदी कोई प्रेग्रम करके आई थी, सारा दिन सफर करके थकी थी, तबियत भी अस्वस्थ थी, फिर भी खुद की परवाह न करके हॉस्पिटल मेें उस बहन को मिलकर ही घर लौटी। दीदी बडे ही रमणीक थी, कैसी भी परिस्थिती आये लेकीन दीदी को हमने सिरीयस मुड़ मेें नही देखा। अपने आलोचकोें के लिए भी रहमदिल थी। अन्य किसी बहन को ऑपरेशन के लिए हॉस्पिटल मेें एड्मिट होना था तब दीदी ने कहां कलसे तुम्हारी परहेज शुरु हो जायेगी। इसलिए उसके मनपसंद मसाले बैैंगन की सब्जी अपने हाथोें से बनाकर खिलाई। ऑपरेशन के बाद भी रोज पुछती थी.. रात को निंद आई ? आज क्या खाने का मन है ? ऐसे लौकिक माँ से भी अधिक प्यार की पालना देती थी दीदी।

दीदी जी ने श्रीमत को ढाल बना कर जितनी रूची से सेवायेें की, उतना ही स्वयं को समेट कर उपराम हो गई। अपने पुराने हिसाब किताब चुक्त कर अपनी बगीया को छोड, विदा हुई २३ अप्रैल २०१६, शाम को….. आपकी पालना से कृतज्ञ आपकी हम सब भुजायेें नतमस्तक होकर, दिल की गहराई से आपको कोटी-कोटी वंदन करते हैैं !
जिसपर सारा जहां पुष्पोें की वर्षा करेें, ऐसी आप बाबा के दिल की रानी थी
जिसने सिंचा विदर्भ को,और आलोकित करेगी विश्व शांति सरोवर को….
ऐसी आप दीदी पुष्पारानी थी!